अध्यात्म : सिद्धेश्वर सिद्धपीठ में आराधना से मिलता है राजयोग

  • आबिद खान
    झांसी। बुंदेलखंड में श्रद्धा, भक्ति और आराधना का अनुपम केन्द्र है श्री सिद्धेश्वर सिद्धपीठ आश्रम। माह में केवल एक बार पड़ने वाले पुष्य नक्षत्र में निर्मित हुये इस मंदिर में आते ही मन और हृदय भक्तिभाव से ओतप्रोत हो जाता है। राजयोग की प्राप्ति के लिये यहां विशेष उपासना का विधान है। पेश है ये खास रिपोर्ट । झांसी के ग्वालियर रोड पर स्थित है श्री सिद्धेश्वर सिद्धपीठ आश्रम। सन 1936 में जब भारत में स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन अपने चरम पर पहुंच रहा था तब अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के साथी पं.आचार्य रघुनाथ विनायक धुलेकर जिन्हें अंग्रेजों ने जेल में बंद कर दिया था को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन दिये। शिवजी ने आचार्य धुलेकर को स्वप्न में कहाकि ग्वालियर मार्ग पर स्थित अपनी भूमि के एक भाग में खुदाई करो वहां से मेरा शिवलिंग प्राप्त होगा और उस शिवलिंग को केवल पुष्य नक्षत्र में निर्मित मंदिर में प्रतिष्ठित करना। शिवजी ने यह भी कहा कि आप जेल से जल्द मुक्त होंगे। जेल से बाहर आते ही आचार्य धुलेकर ने निर्देशित स्थान पर खुदाई कराई जहां 10 फुट की गहराई से वास्तव में भगवान शिवलिंग व नन्दी का दिव्य विग्रह प्राप्त हुआ। शिवलिंग को एक चटटान पर स्थापित कर माह में पड़ने वाले पुष्य नक्षत्र में मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हो गया। दक्षिण भारतीय शैली पर निर्मित हो रहे इस मंदिर का निर्माण कार्य उस समय रूक गया जब आचार्य रघुनाथ धुलेकर का स्वर्गवास हो गया। लगभग 10 वर्ष बाद चित्रकूट में मंदाकिनी के तट पर शिवजी ने आचार्य पं. हरिओम पाठक को दर्शन देकर झांसी जाने को कहा और बताया कि ग्वालियर मार्ग पर मेरा अर्द्धनिर्मित शिवालय है जिसका कार्य तुम्हें पूर्ण कराना है। उसके बाद से आचार्य हरिओम पाठक ने मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण कराया । आज ये मंदिर दिव्य तीर्थ का रूप ले चुका है। इस मंदिर में उपासना करने से यूं तो सभी के मनोयोग पूर्ण होते है लेकिन पुष्य नक्षत्र में निर्मित होने के कारण यहां राजयोग की प्राप्ति चाहने वाले साधना करते हैं तो उन्हें विशेष लाभ होता है। जिसके कई उदाहरण आचार्य हरिओम पाठक बताते हैं।
  • आचार्य हरिओम पाठक की तन्मयता

    इस मंदिर के संपूर्ण निर्माण से लेकर अब तक इसका विस्तार आचार्य हरिओम पाठक एक तवस्वी के रूप में कर रहे हैं । आचार्य जी के प्रयास से अब यहां मां पीताम्बरा मंदिर, मां त्रिपुर सुंदरी मंदिर, इच्छापूरन हनुमानजी का मंदिर, मां दुर्गा जी, मां सरस्वती, भगवान गणेश, वार्ष्णेय मंदिर, शनि मंदिर स्थापित हो चुके हैं । इसके साथ ही साईबाबा का विशाल मंदिर उपासना का बड़ा केन्द्र बन गया है। आचार्य जी की रचनात्मक कार्यशैली के चलते यहां कई बड़े धार्मिक व सांस्कृतिक आयोजन होते रहते हैं जिसमें हर धर्म, जाति और वर्ग के लोग बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं। आचार्य जी के कुशल निर्देशन में श्री सिद्धेश्वर सिद्धपीठ पर लक्षचण्डी महायज्ञ और पीताम्बरा महायज्ञ जैसे दिव्य कार्यक्रम सम्पन्न हुये हैं। आचार्य हरिओम पाठक कहते हैं कि उनके सदगुरू दतिया वाले महाराज जी ने उन्हेंं लोककल्याण के कार्य संपादित करने का दायित्व सौंपा था जिसका वे निर्वहन करनें का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहाकि पूरा संसार एक कुटुम्ब है । जब हम एक-दूसरे का हित सोचकर कार्य करेंगे तभी खुद का और जगत का कल्याण संभव हो सकेगा।

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