थियेटर करने का उददेश्य बॉलीवुड कभी नहीं रहा : मीता वशिष्ठ

धर्मेन्द्र साहू
मुम्बई। आंखों में चपलता लेकिन चेहरे पर उतनी ही गंभीरता और बातों में हृदयस्पर्शी शालीनता। ये उस व्यक्तित्व की बात हो रही है जिसे फिल्म जगत में मीता वशिष्ठ के नाम से जाना जाता है। अपनी कई चर्चित फिल्मों और सीरियलों के माध्यम से बॉलीवुड में अलग पहचान बना चुकीं मीता आज भी अपने आपको रंगकर्मी कहलाना ज्यादा पसंद करती हैं।
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में मीता वशिष्ठ ने न केवल अध्ययन किया बल्कि बाद में वे वहां प्रशिक्षक भी रहीं। अपने कई प्रसिद्ध थियेटर शोज के जरिये मीता वशिष्ठ ने अभिनय के क्षेत्र में अपनी धाक जमाई। उन्होंने बताया कि विशुद्ध रूप से वे आज भी एक रंगकर्मी हैं और उन्होंने कभी भी बॉलीवुड ज्वाइन करनें के लिये थियेटर नहीं किया था, शोहरत और नाम कमाना उददेश्य नहीं रहा बल्कि थियेटर को साधना के रूप में जीवन में उतारा। वो एक जुनून था। ये अलग बात है कि दर्शकों ने अभिनय को सराहा और फिल्म व टीवी कलाकार के रूप में प्रसिद्धी प्रदान की ।
मीता वशिष्ठ ने थियेटर के जरिये समाज सेवा की और ऐसी जिम्मेवारी संभाली जो शायद कम लोग ही कर पाते हैं। उन्होंने मंडला थियेटर आर्ट मॉडयूल के जरिये महिलाओं के रिमांड होम में बाकायदा पांच साल तक काम किया । उन्होंने समाज की मुख्यधारा से हट चुकीं असहाय लड़कियों की पीड़ा को समझा। रिमांड होम में आईं उन लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाया जो या तो रेड लाइट एरिया से आई थीं या फिर कोठों में धकेली जा रहीं थीं। कई नाबालिग लड़कियों का जीवन शुरू होने के पहले ही खत्म होने वाला था लेकिन मीता के जज्बे ने उम्मीद की नई किरण प्रकाशित की नतीजतन कई लड़कियां शिक्षित होकर आत्मनिर्भर बनी और कईयों की अच्छे परिवारां में शादी हो गईं। हालांकि इन पांच सालों में मीता वशिष्ठ हर तरफ से थक गईं थीं, आर्थिक हालात भी जर्जर हो गये थे लेकिन उन्होंने अपने आपको इससे उबारा।
इस काम से मीता को आत्मसंतुष्टि जरूर मिली लेकिन उनके चेहरे पर सिकन इस बात से आ जाते हैं कि किसी की पीड़ा को कम करने का प्रयास करने के बजाय ईगो प्रॉब्लम के चलते सरकारें मदद करने वाले का ही उत्पीड़न शुरू कर देती है और वो चाहे किसी भी रूप में हो। मीता कहती हैं कि अहंकार के आगे लोग समाज और देश को ही भूल जाते हैं इसका प्रत्यक्ष रूप मैंने खुद देखा हैं।

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