पृथक बुंदेलखंड राज्य : राजनीतिक उपेक्षा से त्रस्त बुंदेलियों का इम्तेहान कब तक  – हरिमोहन विश्वकर्मा 

बुन्देलखंड राज्य निर्माण के प्रबल पैरोकारों में से एक हरिमोहन विश्वकर्मा बुन्देलखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक सदस्य और वर्तमान अध्यक्ष हैं। लगभग 3 दशक से पृथक बुन्देलखंड राज्य की मांग को धारदार तेवर देने के आरोपों में सरकार इन्हें रासुका में भी निरुद्ध रख चुकी है। संसद व विधानसभाओं में पर्चे फेंक कर सरकारों तक 3  करोड़ बुन्देलियो की आवाज बन चुके हैं ।खास रिपोर्ट डॉट कॉम की इस विशेष श्रृंखला में आज हरिमोहन विश्वकर्मा से हमने बुन्देलखंड आन्दोलन के वर्तमान हालात और पृथक राज्य के गठन की संभावनाओं पर जानने की कोशिश की।

(धर्मेन्द्र साहू)

झाँसी। बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष हरिमोहन विश्वकर्मा ने कहाकि बुन्देलखंड क्षेत्र की वर्तमान दुर्दशा को समझने के लिए समस्या को जड़ से समझना होगा। दरअसल बुन्देलियो की बदहाली की असल कहानी आजादी के 9 साल बाद लिखी गई जब 1956 में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट के बाद देश में आठ नये राज्यों का गठन किया गया। इस गठन के पूर्व आई रिपोर्ट में बुन्देलखंड को भी राज्य बनाने की प्रबल सिफारिश थी जिसे तत्कालीन हुक्मरानों ने दरकिनार किया और प्राकृतिक क्षेत्र बुन्देलखंड को मध्यप्रदेश व उत्तर प्रदेश में बांटा। इस बंटवारे के साथ ही बुन्देलियो के दुर्भाग्य की कहानी लिख दी गई।
खास रिपोर्ट डॉट कॉम को  हरिमोहन विश्वकर्मा ने बताया कि  बुन्देलखंड का बंटवारा एक गैरवाजिब विभाजन था । इससे बुन्देलखंड वासियों के सामने न सिर्फ सीमा विवाद, कर विवाद, जल विवाद, राजनीतिक विभाजन जैसी जटिल समस्याओं के कारण गंभीर स्थिति देखी बल्कि चम्बल और पाठा के दुर्गम जंगलों और उप्र- मप्र की सीमाओं का लाभ उठाकर पनपे दस्युओं का आतंक झेला।
उन्होंने बताया कि आज बुन्देलखंड में जल, बिजली, स्वास्थ्य, सडक, शिक्षा जैसी सामान्य मूलभूत सुविधाओं के अभाव में बुन्देलखंड निरंतर बाढ, सूखा, भुखमरी, बेरोजगारी, पलायन को झेल रहा है। उप्र- मप्र जैसे दो राज्यों के बीच फंसकर पिछड़ेपन का दंश झेल रहे बुन्देलखंड तक विकास योजनाओं की रोशनी आने से पहले ही बुझ जाती है। हम इन समस्याओं के निदान के लिए ही बुन्देलखंड क्षेत्र का एकीकरण कर पृथक बुन्देलखंड की लडाई को पिछले 27 साल से लड़ रहे हैं।
विश्वकर्मा के मुताबिक पृथक बुन्देलखंड राज्य की मांग हेतु बुन्देलियो के इस संघर्ष के फलीभूत होने का समय आ गया है लेकिन उससे पहले बुन्देलियो को एक बार पुनर्गठित होकर केन्द्र और दोनों राज्य सरकारों के सामने डटकर खड़े  होना होगा क्योंकि सत्ता लोलुप हमारे खुद के जनप्रतिनिधि तक इस मुद्दे पर चुप हैं और सिर्फ और सिर्फ चुनावी मौसम में उन्हें बुन्देलखंड और यहां के वासियों की याद आती है।
उन्होंने कहाकि इन्हीं जननेताओ में बुन्देलखंड की कद्दावर नेता उमा भारती भी हैं जिन्होंने 2014 में खुद झाँसी से लोकसभा चुनाव लड़ा  और सरकार गठन के 3 साल के अंदर बुन्देलखंड राज्य के गठन का वादा किया नतीजतन बुन्देलखंड की आठों लोकसभा सीटों पर बुन्देलियो ने भाजपा को जिताया लेकिन इसके बावजूद इन नेताओं के राजनीतिक दांवपेंचो में बुन्देलखंड आज भी उलझा है। अब ये दुर्भाग्य ही है और सरकारों का बहरापन है जो उसे बुन्देलियो की शान्त लेकिन दृढ आवाज सुनाई नहीं देती शायद सरकार चाहती है कि हर आन्दोलन की तरह ही बुन्देली भी अहिंसा का मार्ग छोडकर अपने मूल लडाके के स्वरूप में लौटें, हथियारबंद हो। सरकार को समझना होगा कि बुन्देलखंडवासी मूलतः संतोषी और शांत प्रकृति का है और स्वाभिमान की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकता है।
उन्होंने कहाकि आज बुन्देलखंडवासी अपने राज्य की प्राप्ति के लिए पूर्णतः सजग और जागरुक है और क्षेत्र में सभी लोकसभा और उप्र में सभी विधानसभा सीटों पर चुनने के बाद भी उनकी बेरुखी के प्रति रोष और आक्रोश से भर रहा है। बुन्देलखंड मुक्ति मोर्चा की भरसक कोशिश है कि केंद्र और राज्य सरकारें पृथक बुन्देलखंड के गठन में सहयोग दें जिससे बुन्देलखंड में स्थिति विस्फोटक न हो।आज लगभग डेढ लाख वर्ग किलोमीटर में फैले बुन्देलखंड के 23 जिलों की 3 करोड से अधिक की आबादी के लिए राज्य चाहिए ही चाहिए,  न इससे कम न इससे ज्यादा। राज्य बनने के बाद हम खुद अपने विकास की लडाई लडने में सक्षम हैं क्योंकि हमारे पास प्रचुर संसाधन भी हैं और श्रमशक्ति भी।
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