जीएसटी में अभी और सुधार की आवश्यकता : गोपाल कृष्ण उक्सा

सरकार ने जीएसटी लागू तो कर दिया है लेकिन उसकी खामियों पर कोई ध्यान नहीं दिया नतीजतन अब सरकार को कई परिवर्तन करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। यही हाल नोटबंदी के दौरान सरकार ने किया था जिसका खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ा था। इस व्यवस्था को लागू करने से पहले सरकार को उस हर वर्ग खास ध्यान रखना चाहिये था जो छोटे स्तर पर व्यापार करते हैं लेकिन हुआ यूॅं कि सरकार ने सीधे ये नीति देश पर थोप दी । हालांकि सरकार ने इसमें कुछ राहत जरूर दी है लेकिन इसमें कई और कमियां हैं जो सरकार को दूर करनी होगी।
गांव तो छाड़िये शहरों में भी आम आदमी अभी इतना जागरूक नहीं हो पाया कि वो जीएसटी को समझ सके। इसके लिये सरकार ने भी कोई खास कदम नहीं उठाये। कल्पना कीजिये कि किसी गांव में छोटा सा व्यापार करने वाले व्यक्ति को जीएसटी के भूत ने कितना परेशान कर रखा होगा। उसके पास न तो सीए उपलब्ध होता है और न ही एडवोकेट। जीएसटी नम्बर लेना इसलिये लोगों की मजबूरी बन गई है कि यदि उसे बैंक में करंट एकाउण्ट खोलना है तो सबसे पहले तो बैंक ही जीएसटी नम्बर मांगता है जबकि इसके लिये सरकार को बैंकों को निर्देशित करना चाहिये था। उसके बाद जिस फर्म को वो माल सप्लाई या फिर अपनी सेवाऐं देता है तो वो कम्पनी भी बिना जीएसटी नम्बर के भुगतान नहीं कर रही है।
हालांकि सरकार ने अभी कुछ राहत जरूर दी है लेकिन इसमें अभी काफी कमियां हैं जिसे जल्द से जल्द दूर किया जाना चाहिये। रिटर्न भरने वाल ई-फॉर्म को भी अति सरल करने की आवश्यकता है ताकि आम व्यापारी भी मोबाईल से ही अपना रिटर्न दाखिल कर सके।
इस प्रणाली से बड़े व्यापारियों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि उनके पास वित्तीय सलाहकार मौजूद हैं लेकिन एक आम व्यापारी का तो जीएसटी ने जीना दुश्वार कर दिया है। ऐसा लग रहा है कि मोदी सरकार योजनाऐं अमल में नहीं ला रही बल्कि लोगों पर जबरन थोप रही है।
जीएसटी एक व्यवस्था है लेकिन वो ही देशवासियों के लिये एक समस्या बन गई है। अपनी वाहवाही लूटने के चक्कर में सरकार आम आदमी को जितना परेशान कर रही है उसे तो हिटलरशाही ही कहा जायेगा।
मोदी जी ने देशभर के प्राईवेट काम करने वालों और व्यापारियों को जीएसटी के भंवरजाल में फंसा कर रख दिया है जबकि उसी आम आदमी ने मोदी पर भरोसा कर उन्हें सत्ता तक पहुंचाया । मोदी जी की कड़वी गोली केवल आम आदमी को खानी पड़ रही है। बड़े मगरमच्छ तो आज भी मौज कर रहे हैं।
उम्मीद की जानी चाहिये कि केन्द्र सरकार कोई भी योजना लागू करन के पहले जनमत संग्रह करवाये और अपनी थोपने वाली नीति में बदलाव करे अन्यथा पानी सिर के ऊपर हो जाने पर बाद में जनता निर्णय कर ही लेगी।

( लेखक जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता व समाजसेवी हैं )

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